Tuesday, March 10, 2009

अशोक आन्द्रे




आस लिए फिर चलती है


नदी किनारे बैठी बुढ़िया
सोच रही है मन में ।
शीत लहर बर्फीला पानी
आग नहीं है तन में ।

सूरज का बचपन कोहरे को
लाँघ नहीं पाया है ।
हिम शिखरों के पीछे से
मौसम भी शरमाया है ।

श्वेत चादरों के नीचे
तेज हवाएं फेंके बाण ।
सूने व खाली मन में
चारों और उठे तूफान ।

ऐसे में जीने की इच्छा
पर फैलाए उठती है ।
बहती नदिया की धारा संग
आस लिए फिर चलती है ।



शांत नदी - सा गाता वक्त


रोज़ सवेरे आता वक्त

साँझ ढले फिर जाता वक्त ।

कठपुतली सा नाच नचाकर

चिड़ियों - सा फुदकाता वक्त ।

आँख मूंद सोने वालों को

बंदर नाच नचाता वक्त ।

कठोर उद्यमी के जीवन में

शांत नदी - सा गाता वक्त ।

कर्म ही जीवन का ध्येय

ऐसा गीत सुनाता वक्त ।

6 comments:

रावेंद्रकुमार रवि said...

स्वागत और बधाई!

रचना गौड़ ’भारती’ said...

होली की हार्दिक् शुभकामनाएं।
सुंदर रचना के लिए बधाईयां।
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहि‌ए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लि‌ए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
मेरे द्वारा संपादित पत्रिका देखें
www.zindagilive08.blogspot.com
आर्ट के लि‌ए देखें
www.chitrasansar.blogspot.com

नारदमुनि said...

vakt hee sabkuchh hai, narayan narayan

Jyotsna Pandey said...

ब्लॉग जगत में आपका हार्दिक स्वागत है .....
मेरी शुभकामनाएं .............

Vivek Ranjan Shrivastava said...

भई वाह !
रंग रची मंगलकामनायें ..

Deepak "बेदिल" said...

aanad maye hai sir ji maza aagaya ...khaskar waqt wali rachnae me...thnx